कारगिल युद्ध की जांबाजी और बॉलीवुड के देशभक्ति कनेक्शन ने जीता दिल

सीमा पर मिली जीत इसलिए रोमांचित करती है, क्योंकि वह सिर्फ युद्ध का अंत नहीं, बल्कि साहस, रणनीति, त्याग और राष्ट्रीय गर्व का चरम क्षण होती है। जब यह जीत बड़े पर्दे पर उतरती है, तो दर्शक सिर्फ युद्ध नहीं देखते, बल्कि साहस, बलिदान और तिरंगे के सम्मान को महसूस करते हैं। इन्‍हें पर्दे पर उतारने के पीछे कलाकारों, निर्देशकों और निर्माताओं की सोच, तैयारी और जिम्मेदारी की पड़ताल करती स्टोरी।

कारगिल के रणबांकुरों की अमर गाथा

‘अब या तो हम इतिहास रचेंगे, या इतिहास बन जाएंगे।’ वेब सीरीज ऑपरेशन सफेद सागर के ट्रेलर में जब भारतीय वायुसेना के जवान 30 हजार फीट की ऊंचाई पर यह संवाद बोलते हैं, तो उन शब्दों में देशभक्ति की भावना झलकती है, जिसने 26 जुलाई 1999 को भारत को पाकिस्तान के खिलाफ कारगिल युद्ध में ऐतिहासिक विजय दिलाई थी।

यह जीत उन अनगिनत वीर जवानों के साहस, त्याग और अदम्य संकल्प का परिणाम थी, जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। भारतीय वायुसेना के ऐतिहासिक ऑपरेशन सफेद सागर ने इस विजय में निर्णायक भूमिका निभाई थी। उस वक्त वायुसेना ने दुर्गम पहाड़ियों पर बैठे पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ दिया था। सीरीज में खास तौर पर स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा के बलिदान को दिखाया गया है। ऑपरेशन सफेद सागर में स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा की भूमिका निभा रहे अभिनेता सिद्धार्थ ने कहा कि यह मेरे लिए सीखने वाला अनुभव रहा है।

हालांकि बिना सेना में गए आप उसकी कार्यशैली को बस महसूस कर सकते हैं, लेकिन हम कलाकारों को वह बनने के लिए पैसे मिलते हैं, जो हम वास्तविक जीवन में नहीं होते। मैंने यह रोल इसलिए किया, क्योंकि ऐसे ऑपरेशन पर बनी कहानियां युवाओं की सोच बदलती है। वह अपने देश को फिर अलग नजर से देखते हैं। ऐसे शोज बातचीत शुरू करते हैं, जब युवा, सेना के युवा अफसरों को ऐसे साहसी काम करते हुए देखते हैं, तो वह उस पर बात करते हैं, प्रेरित होते हैं।

सैनिकों के साहस को जीने की कोशिश

भारत की जीत को पर्दे पर उतारना केवल युद्ध के दृश्य फिल्माना नहीं, बल्कि उन सैनिकों के साहस, अनुशासन और जज्‍बातों को ईमानदारी से जीने की कोशिश होती है। फिल्म गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल में फ्लाइट कमांडर ऑफिसर बने अभिनेता विनीत कुमार सिंह कहते हैं, “गुंजन सक्सेना ने कारगिल युद्ध में जिस इलाके से घायल सैनिकों को रेस्क्यू किया था, वहीं हम शूट कर रहे थे। मैं यूनिफॉर्म में था, हेलिकाप्टर का पंखा जब चलना शुरू हुआ और निर्देशक ने एक्शन बोला, वह अहसास ही अलग था। शूटिंग के दौरान महसूस हो रहा था कि यह सब सच में हुआ है। असली युद्ध क्षेत्र बार-बार रीशूट की कोई गुंजाइश नहीं होती, क्योंकि जीवन दांव पर होता है। पूरे समय वह विचार घूम रहा था।”

जब भी बड़े पर्दे पर बार्डर या एलओसी

कारगिल या युद्ध पर आधारित दूसरी फिल्में आती हैं, तो वे सिर्फ मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि देशभक्ति का जज्‍बा जगाती हैं और वीर जवानों के साहस व बलिदान पर गर्व करने का अवसर भी देती हैं। निर्देशक जेपी दत्ता मानते हैं कि युद्ध नायकों की कहानियां बार-बार पर्दे पर आनी चाहिए, क्योंकि ऐसी फिल्में नई पीढ़ी में राष्ट्रप्रेम और देशसेवा की भावना को मजबूत करती हैं।

उन्‍होंने कहा था कि युद्ध के नायकों पर जितनी भी फिल्में बनाई जा सकती हैं, बननी चाहिए। लोगों को समझ आना चाहिए कि जीत हमेशा एक कीमत पर मिलती है। जवान हमारे परिवारों की रक्षा के लिए अपने परिवारों को पीछे छोड़ देते हैं। फिल्में दर्शकों को प्रभावित करती हैं। उनके माध्यम से देशभक्ति को बढ़ाने, लोगों को सेना में शामिल होने या देश सेवा के लिए प्रेरित कर पाते हैं, तो मुझे लगता है कि मैंने भी अपना योगदान दिया है।

वर्दी पहनते ही जाग उठता है देशभक्ति का जज्बा

युद्ध की कहानियां सिर्फ गोलियों और रणभूमि की नहीं होतीं, बल्कि उन जज्बातों की होती हैं, जिनकी बदौलत तिरंगा शान से लहराता है। जब कोई कलाकार सैन्य वर्दी पहनकर किसी युद्ध नायक का किरदार निभाता है, तो वह केवल अभिनय नहीं करता, बल्कि देशभक्ति, कर्तव्य और विजय की उस भावना को भी जीता है, जिसे हमारे सैनिक वास्तविक युद्धभूमि में हर दिन जीते हैं। द टेस्ट केस और कोड एम जैसे सैन्य-आधारित प्रोजेक्ट्स के निर्माता समर खान भी मानते हैं कि किसी भी कलाकार का सपना सैन्‍य वर्दी का रोल करना होता है।

दरअसल, वर्दी पहनते ही देश के प्रति वो जज्‍बा अपने आप ही जग जाता है। उसका फिल्मांकन करते समय आप उस इमोशन को महसूस कर पाते हैं, क्‍योंकि आप उस क्षण को जी रहे होते हैं। आप अपने दुश्‍मन को मार रहे होते हैं। आप देश की जीत के लिए दिलोजान से मिशन में जुटे होते हैं। जब हम उस सीक्‍वेंस को शूट कर रहे होते हैं, तो यह हमारा हिस्‍सा बन जाते हैं। जब आप तिरंगे को सलाम कर रहे होते हैं तो अपने आप आपको उस पर गर्व होता है। देशभक्ति का भाव जग जाता है। यह अहसास वहां मौजूद लोगों और स्‍क्रीन पर देख रहे दर्शकों को भी होने लगता है।

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