चैत्र नवरात्र के नौवें और अंतिम दिन यानी महानवमी (Mahanavmi) तिथि पर मां दुर्गा के पूर्ण और अलौकिक स्वरूप ‘मां सिद्धिदात्री’ (Maa Siddhidatri) की पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि स्वयं भगवान शिव ने भी कठोर तपस्या करके इन्हीं देवी से समस्त सिद्धियां प्राप्त की थीं। इसके फलस्वरूप उनका आधा शरीर देवी का हुआ और वे ‘अर्धनारीश्वर’ कहलाए।
चैत्र नवरात्र (Chaitra Navratri 2026) की प्रतिपदा से शुरू हुई नौ दिनों की अखंड साधना, संयम और तपस्या महानवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की अनुकंपा से ही सफलता प्राप्त करती है। शास्त्रों के अनुसार, चैत्र नवरात्र की नवमी पर मां सिद्धिदात्री की विधिवत पूजा के बाद उनकी पावन कथा का श्रवण या पठन अत्यंत जरूरी माना गया है।
अगर आपने भी नौ दिनों का व्रत रखा है या माता की साधना की है, तो आइए सुनते हैं मां सिद्धिदात्री की वह महिमामयी कथा, जो आपकी हर मनोकामना को पूरी करेगी।
मां सिद्धिदात्री की कथा (Chaitra Navratri Day 9 Katha)
एक बार भगवान शिव ने भी मां सिद्धिदात्री की कठोर तपस्या की थी और उन्हीं की कृपा से भोलेनाथ को सभी तरह सिद्धियां प्राप्त हुईं। इसी कारण भगवान शिव का एक रूप ‘अर्धनारीश्वर’ भी कहलाता है, जिसमें वे आधे शिव और आधी शक्ति के रूप में विराजमान हैं। ऐसी मान्यता है कि मां सिद्धिदात्री की आराधना के बिना किसी भी देवी-देवता की पूजा पूरी नहीं होती। देवी सिद्धिदात्री हिमालय पर्वत के शिखर पर निवास करती हैं और वे सभी सिद्धियों की रक्षा करती हैं।
उनकी कृपा से भक्तों को ज्ञान, बुद्धि, धन और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। जो भक्त नवरात्रि के नौवें दिन सच्चे मन से मां सिद्धिदात्री की पूजा करते हैं और उनकी कथा का पाठ करते हैं, उन्हें जीवन में किसी भी प्रकार की कमी नहीं रहती।
कथा का समापन और समर्पण
जब कथा पूर्ण हो जाए, तो माता की आरती करें। माता को अपनी सामर्थ्य के अनुसार भोग (प्रसाद) अर्पित करें।
क्षमा याचना
अंत में, बहुत ही विनम्रता से मां से क्षमा याचना करें। कहें- “हे मां, पूजा और कथा के दौरान जाने-अनजाने मुझसे जो भी त्रुटियां या गलतियां हुई हों, कृपया मुझे अबोध बालक समझकर क्षमा करें।” शास्त्रों में कहा गया है कि जो भक्त ऐसा करते हैं, मां की कृपा से उनके सभी कष्टों, दुखों और संतापों का अंत होता है।

