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भारतीय दृष्टि से होना चाहिए भारत का मूल्यांकन: सुरेश सोनी

‘भारतीय ज्ञान परंपरा अनादिकाल से आज तक कम ज्यादा तो हुआ होगा, लेकिन इसका प्रवाह नहीं टूटा। समय के प्रवाह में जो उपयुक्त था, उसे भारतीय ज्ञान परंपरा की भाषा में शामिल किया गया।

यही कारण है कि वर्तमान में भी भारतीय ज्ञान परंपरा की आवश्यकता महसूस की जा रही है।’ यह कहना था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सह सरकार्यवाह और भारतीय ज्ञान परंपरा अध्येता सुरेश सोनी का। वे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आइजीएनसीए) के कलानिधि विभाग की ओर से आयोजित देवेंद्र स्वरूप स्मृति व्याख्यान में बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे।

उन्होंने कहा कि साहित्यकारों ने हमेशा समाज को नई दिशा देने का काम किया है। भारतीय संस्कृति के मूल्यों, परंपरा और दर्शन के सकारात्मक पक्ष को समाज के बीच ले जाने का जिन्होंने काम किया, उनमें देवेंद्र स्वरूप का भी अहम योगदान है। इतिहास को भारतीय दृष्टि से परखने की जरूरत को बताते हुए उन्होंने कहा कि कई विद्वान विदेशी नजरिए से भारत का मूल्यांकन करते हैं, जो ठीक नहीं है। भारत का मूल्यांकन भारतीय दृष्टि से ही किया जाना चाहिए।

देवेंद्र स्वरूप के निजी संग्रह के अंतर्गत आयोजित व्याख्यान माला के प्रथम व्याख्यान और देवेंद्र स्वरूप फैलोशिप के शुभारंभ पर आइजीएनसीए के अध्यक्ष राम बहादुर राय ने भी कहा कि हमारा जीवन के प्रति दृष्टिकोण अनुभव आधारित है और पश्चिम देशों का तर्क आधारित।

साहित्य में अनुभव आधारित दृष्टिकोण को समाहित करने वाले देवेंद्र स्वरूप ने भारतीय चिंतन परंपरा की भी सेवा की। समारोह में आइजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी और कलानिधि विभाग के अध्यक्ष डॉ. रमेश चंद्र गौड़ समेत बड़ी संख्या में साहित्यकार की उपस्थित रहे।

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