अनिल अग्रवाल की वेदांता ने 2575 करोड़ रुपए जुटाने (Anil Agarwal Vedanta Raises 2575 Crore) के लिए बड़ा कदम उठाया। इसके लिए उन्होंने हिंदुस्तान जिंक (Hindustan Zinc Encumbrance) में अपनी 50.1% हिस्सेदारी पर ‘एन्कम्ब्रेंस’ यानी प्रतिबंध लगा दिया है।
कंपनी ने स्टॉक एक्सचेंज को दी जानकारी में बताया कि
यह रकम नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर्स (NCDs) जारी करके जुटाई गई है। यह पूरा फंड प्राइवेट प्लेसमेंट के जरिए उठाया गया है, जिससे साफ है कि वेदांता ने सीधे चुनिंदा निवेशकों से पैसा लिया है।
इस डील के तहत एक्सिस ट्रस्टी सर्विसेस लिमिटेड (Axis Trustee Services Limited) को डिबेंचर ट्रस्टी नियुक्त किया गया है, जो निवेशकों के हितों की निगरानी करेगा।
हिंदुस्तान जिंक पर लगा एन्कम्ब्रेंस क्या है?
सबसे अहम बात यह है कि इस फंड जुटाने के बदले वेदांता ने अपनी सबसे मजबूत एसेट मानी जाने वाली कंपनी हिंदुस्तान जिंक में 50.1% हिस्सेदारी (Vedanta Hindustan Zinc 50.1% Stake) को गिरवी जैसा सुरक्षा कवच बनाया है।
इसे ही ‘एन्कम्ब्रेंस’ कहा जाता है, यानी जब तक कर्ज पूरा नहीं चुकता होता, इस हिस्सेदारी पर कुछ शर्तें लागू रहेंगी। इस कदम से यह संकेत मिलता है कि कंपनी अपने कैश फ्लो और फाइनेंसिंग जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने बड़े एसेट्स का इस्तेमाल कर रही है।
पहले से ही कर्ज में दबा है वेदांता ग्रुप
मार्केट एक्सपर्ट्स के मुताबिक, वेदांता ग्रुप पर पहले से कर्ज का दबाव है और ऐसे में एनसीडी (Vedanta 2575 Crore NCD) के जरिए पैसा जुटाना एक रणनीतिक फैसला माना जा रहा है।
हालांकि, हिंदुस्तान जिंक जैसी मजबूत और मुनाफा देने वाली कंपनी की हिस्सेदारी पर एन्कम्ब्रेंस लगाना निवेशकों के लिए एक अहम संकेत भी है।
सरल भाषा में समझें तो अगर कंपनी तय शर्तों के मुताबिक भुगतान नहीं कर पाती है, तो इस हिस्सेदारी पर असर पड़ सकता है।
नियमों के तहत हुई पूरी प्रक्रिया- वेदांता
वेदांता ने यह भी साफ किया है कि यह पूरी प्रक्रिया नियमों के तहत और तय शर्तों के अनुसार की गई है। कुल मिलाकर, अनिल अग्रवाल की वेदांता का यह कदम फंड जुटाने के लिहाज से अहम जरूर है, लेकिन हिंदुस्तान जिंक में हिस्सेदारी पर लगा प्रतिबंध बाजार में चर्चा का बड़ा कारण बन गया है।
अब निवेशकों की नजर इस बात पर रहेगी कि कंपनी इस फंड का इस्तेमाल कैसे करती है और आगे कर्ज कम करने की दिशा में क्या कदम उठाती है।

