सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे खास माना जाता है। इन दिनों हर जगह शिव मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है। कोई कांवड़ में गंगाजल लाकर भगवान को अर्पित कर रहा है, तो कोई विधि-विधान से पूजा कर रहा है। हालांकि, आज सावन का आखिरी सोमवार है। जोरों-शोरों से लोग अपने घरों में रुद्राभिषेक जैसा पवित्र कार्य करवा रहे हैं।
कई लोग जलाभिषेक और रुद्राभिषेक को एक ही समझ लेते हैं। जबकि, हिंदू धर्म और शास्त्रों में इन दोनों अनुष्ठानों के बीच एक बहुत बड़ा अंतर बताया गया है। आइए समझते हैं कि जलाभिषेक क्या है, रुद्राभिषेक किसे कहते हैं और इन दोनों को करने का सही तरीका क्या है।
जलाभिषेक की सरल विधि
शिवलिंग पर सिर्फ शुद्ध जल चढ़ाने की प्रक्रिया को ‘जलाभिषेक’ कहा जाता है। यह शिव पूजा की सबसे आसान और सामान्य विधि है। इसके लिए किसी विशेष नियम या भारी-भरकम सामग्री की जरूरत नहीं होती। आप इसे रोज सुबह अपने घर के मंदिर में या पास के शिवालय में जाकर कर सकते हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के समय जब भगवान शिव ने हलाहल विष पी लिया था, तो उनके शरीर में भयंकर जलन होने लगी थी। उसी जलन को शांत करने और उन्हें ठंडक देने के लिए देवताओं ने उन पर जल चढ़ाया था। बस तभी से शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा की शुरुआत हो गई। जलाभिषेक के लिए किसी पंडित की जरूरत नहीं होती, आप खुद ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप करते हुए एक लोटा जल चढ़ा सकते हैं। इससे आपकी पूजा सफल मानी जाएगी।
रुद्राभिषेक विशेष सामग्रियों से सजी वैदिक पूजा
वहीं, अंगर बार रुद्राभिषेक की की जाए तो यह एक बहुत ही खास अनुष्ठान है। यह पूजा केवल जल चढ़ाने तक ही सीमित नहीं है। जब वैदिक मंत्रों के उच्चारण और विशेष पूजन सामग्री के साथ शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है, तब उसे रुद्राभिषेक कहते हैं।
इस पूजा में ब्राह्मणों या योग्य पुरोहितों द्वारा यजुर्वेद के ‘रुद्राष्टाध्यायी’ मंत्रों का पाठ किया जाता है। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए इसमें सबसे पहले शुद्ध जल, फिर गाय का दूध, दही, घी, शहद और गन्ने का रस जैसी पवित्र चीजों जिसे हम पंचामृत भी कहते हैं उससे शिवलिंग को स्नान कराया जाता है।
क्यों किया जाता है रुद्राभिषेक?
‘रुद्र’ का अर्थ है दुखों का नाश करने वाला। शिव के इस उग्र लेकिन दयालु रूप की पूजा खास मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए की जाती है। माना जाता है कि रुद्राभिषेक करने से जीवन की बड़ी-बड़ी बाधाएं दूर हो जाती हैं। लोग मानसिक शांति, अच्छी सेहत, संतान प्राप्ति और राहु, केतु व शनि जैसे ग्रहों के बुरे प्रभाव (ग्रह दोष) को शांत करने के लिए यह अनुष्ठान करवाते हैं।
