नई दिल्ली/चेन्नई, 26 सितंबर 2026: भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट बोर्ड (TDB) और चेन्नई की स्पेस-टेक कंपनी Agnikul Cosmos Pvt. Ltd. के बीच ₹200 करोड़ की वित्तीय सहायता का समझौता हुआ है। यह सहायता Research Development and Innovation (RDI) Fund के तहत दी जाएगी और इसका इस्तेमाल कंपनी के Agnibaan RLV यानी रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल को विकसित करने में किया जाएगा।

सरकार के मुताबिक इस परियोजना का लक्ष्य ऐसा लॉन्च सिस्टम तैयार करना है जिसे बार-बार इस्तेमाल किया जा सके। यानी परियोजना केवल रॉकेट के पहले चरण को वापस लाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की री-यूजेबिलिटी पर काम किया जाएगा। इससे भविष्य में लॉन्च की आवृत्ति बढ़ाने, निर्माण और प्रक्षेपण लागत कम करने तथा अंतरिक्ष मलबा घटाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
क्या है Agnibaan RLV और क्यों है यह प्रोजेक्ट खास?
Agnikul Cosmos का प्रस्तावित Agnibaan RLV अगली पीढ़ी के रीयूजेबल स्पेस लॉन्च सिस्टम के रूप में विकसित किया जा रहा है। सरकारी जानकारी के मुताबिक इस परियोजना में तकनीक को Technology Readiness Level (TRL)-4 से आगे बढ़ाकर TRL-8 तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। इसका मतलब है कि तकनीक को शुरुआती प्रोटोटाइप स्तर से आगे ले जाकर अधिक उन्नत और वास्तविक परिचालन उपयोग के करीब पहुंचाने पर जोर रहेगा।
इस परियोजना को Optionally Convertible Debentures (OCD) के जरिए वित्तीय समर्थन दिया जाएगा। यानी यह सामान्य अनुदान के बजाय एक संरचित वित्तीय सहायता व्यवस्था है, जिसके माध्यम से कंपनी को बड़े स्तर पर तकनीकी विकास के लिए पूंजी उपलब्ध कराई जाएगी।
पूरी तरह रीयूजेबल लॉन्च सिस्टम पर फोकस
स्पेस इंडस्ट्री में रीयूजेबिलिटी को लागत कम करने और लगातार लॉन्च करने की क्षमता बढ़ाने वाली महत्वपूर्ण तकनीक माना जाता है। मौजूदा कई लॉन्च सिस्टमों में कुछ हिस्सों को दोबारा इस्तेमाल करने या केवल पहले चरण की रिकवरी पर जोर रहता है। Agnikul की नई परियोजना इससे आगे जाकर full-system reusability की दिशा में काम करेगी।
प्रस्तावित सिस्टम में रीयूजेबल अपर स्टेज, डिसेंट प्रोपल्शन सिस्टम और नियंत्रित वापसी एवं रिकवरी से जुड़ी तकनीकों को विकसित किया जाएगा। परियोजना में ऐसे प्रोपल्शन सिस्टम पर भी काम होगा, जिन्हें आवश्यकता के अनुसार रीस्टार्ट और डीप थ्रॉटलिंग किया जा सके। ये क्षमताएं किसी लॉन्च वाहन को नियंत्रित तरीके से नीचे लाने और लैंडिंग जैसी प्रक्रियाओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
लागत कम करने और बार-बार लॉन्च की तैयारी
सरकार का कहना है कि Agnibaan RLV का आर्किटेक्चर ऐसे high-frequency और repeatable launches को सक्षम बनाने के उद्देश्य से तैयार किया जा रहा है, जिनमें लॉन्च और मैन्युफैक्चरिंग लागत कम हो सके। बार-बार एक ही लॉन्च सिस्टम का इस्तेमाल किए जाने से प्रत्येक मिशन के लिए पूरी तरह नया हार्डवेयर तैयार करने की जरूरत घट सकती है।
इसके साथ ही रीयूजेबल तकनीक अंतरिक्ष मलबे को कम करने में भी भूमिका निभा सकती है। हालांकि वास्तविक लागत बचत और परिचालन क्षमता का आकलन वाहन के विकास, परीक्षण और सफल परिचालन के बाद ही किया जा सकेगा।
Agnikul पहले ही दिखा चुकी है तकनीकी क्षमता
Agnikul Cosmos का अंतरिक्ष क्षेत्र में काम नया नहीं है। कंपनी ने पहले Agnibaan नाम के स्वदेशी ऑर्बिटल-क्लास लॉन्च व्हीकल पर काम किया है। कंपनी का Agnilet इंजन एक सिंगल-पीस 3D-प्रिंटेड रॉकेट इंजन है, जिसे कंपनी ने इन-हाउस विकसित और निर्मित किया है।
30 मई 2024 को Agnikul ने Agnibaan SOrTeD का सफल सब-ऑर्बिटल परीक्षण किया था। सरकारी जानकारी के अनुसार यह मिशन भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र में कई अहम उपलब्धियों से जुड़ा था और इसमें सिंगल-पीस 3D-प्रिंटेड रॉकेट इंजन का इस्तेमाल किया गया था।
उस समय कंपनी ने आगे चलकर ऑर्बिटल मिशनों और रीयूजेबल टेक्नोलॉजी की दिशा में बढ़ने की योजना भी बताई थी।
छोटे सैटेलाइट लॉन्च में भी बढ़ सकती है भारत की क्षमता
Agnibaan के शुरुआती विकास का एक अहम उद्देश्य छोटे उपग्रहों को अंतरिक्ष में पहुंचाना रहा है। सरकार के दिसंबर 2024 के विवरण के मुताबिक Agnibaan को 30 से 300 किलोग्राम तक के पेलोड के लिए डिजाइन किया गया है और इसे छोटे सैटेलाइट मिशनों के लिए समर्पित एवं लचीला लॉन्च विकल्प बनाने की दिशा में विकसित किया गया है।
ऐसे में Agnibaan RLV का विकास भारत के बढ़ते निजी स्पेस इकोसिस्टम के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। स्टार्टअप कंपनियों के लिए सैटेलाइट लॉन्च की लागत, उपलब्धता और लॉन्च की आवृत्ति बड़े मुद्दे हैं। रीयूजेबल सिस्टम के सफल विकास से भविष्य में इस क्षेत्र में नए व्यावसायिक अवसर पैदा हो सकते हैं।
सरकार के RDI Fund से निजी स्पेस कंपनियों को बढ़ावा
Agnikul को मिली ₹200 करोड़ की सहायता RDI Fund के तहत दी जा रही है। यह फंड ऐसे उन्नत तकनीकी प्रोजेक्ट्स को समर्थन देने के लिए बनाया गया है जिन्हें विकास के लिए लंबे समय और पर्याप्त पूंजी की आवश्यकता होती है। TDB, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के तहत काम करने वाला वैधानिक निकाय है।
भारत सरकार पिछले कुछ वर्षों में निजी कंपनियों की अंतरिक्ष क्षेत्र में भागीदारी बढ़ाने के लिए कई नीतिगत कदम उठा चुकी है। जुलाई 2026 में सरकार ने संसद में बताया था कि 2026 में अब तक गैर-सरकारी संस्थाओं से जुड़े स्पेस सेक्टर में 187 मिलियन डॉलर का निवेश रिपोर्ट किया गया था और 108 प्राधिकरण प्रदान किए जा चुके थे।
TDB ने क्या कहा?
TDB के सचिव राजेश कुमार पाठक के मुताबिक भारत के अगले चरण के स्पेस कार्यक्रम में ऐसी तकनीकों की जरूरत है जो केवल ऑर्बिट तक पहुंचने तक सीमित न रहें, बल्कि अधिक आवृत्ति, लचीलापन और दक्षता के साथ लॉन्चिंग को संभव बनाएं। उनके अनुसार रीयूजेबिलिटी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण तकनीकी क्षेत्र है और RDI Fund के जरिए स्वदेशी तकनीकों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
Agnikul के प्रमोटर्स ने भी कहा है कि रीयूजेबिलिटी हासिल करने के लिए प्रोपल्शन, वाहन डिजाइन, गाइडेंस, रिकवरी और मिशन ऑपरेशंस को एक भरोसेमंद सिस्टम में एकीकृत करना जरूरी है। कंपनी के अनुसार सरकारी समर्थन से Agnibaan के विकास को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।
भारत के स्पेस सेक्टर के लिए आगे क्या?
₹200 करोड़ की यह सहायता Agnibaan RLV के विकास और तकनीकी सत्यापन के अगले चरण के लिए है। अब कंपनी को रीयूजेबल आर्किटेक्चर से जुड़े प्रोपल्शन, चढ़ाई, ऑर्बिटल इंसर्शन, डिसेंट और रिकवरी सिस्टम विकसित और परीक्षण करने होंगे।
हालांकि, सरकारी सहायता मंजूर होना और रीयूजेबल रॉकेट का सफलतापूर्वक परिचालन शुरू होना दो अलग-अलग चरण हैं। प्रस्तावित प्रणाली को कई तकनीकी परीक्षणों और सत्यापन प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। इसलिए इसे अभी विकासाधीन रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल परियोजना के रूप में देखना अधिक सटीक है।
निष्कर्ष
Agnikul Cosmos को मिली ₹200 करोड़ की RDI सहायता भारत के निजी स्पेस सेक्टर के लिए एक महत्वपूर्ण वित्तीय और तकनीकी पहल है। Agnibaan RLV परियोजना का लक्ष्य पूर्ण सिस्टम की रीयूजेबिलिटी, नियंत्रित रिकवरी और बार-बार लॉन्च की क्षमता विकसित करना है। अगर कंपनी अपने तकनीकी लक्ष्यों को सफलतापूर्वक हासिल करती है, तो इससे भारत की घरेलू लॉन्च क्षमता और कम लागत वाले अंतरिक्ष परिवहन के क्षेत्र में नई संभावनाएं खुल सकती हैं।


