होर्मुज में अमेरिका दोहराने जा रहा गैलीपोली जैसी रणनीतिक भूल

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के केंद्र में होर्मुज जलडमरूमध्य बना हुआ है, जहां से वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का करीब 20 प्रतिशत गुजरता है। युद्ध जैसी परिस्थितियों के बीच ईरान ने इस रणनीतिक मार्ग को अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए बंद कर दिया था, जबकि तटस्थ और समर्थक देशों के जहाजों को सीमित आवाजाही की अनुमति दी गई।

इसके जवाब में अमेरिका ने आर्थिक दबाव बढ़ाते हुए होर्मुज के बाहर नौसैनिक नाकेबंदी कर रखी है। विशेषज्ञ इस स्थिति की तुलना प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1915 के गैलीपोली अभियान से कर रहे हैं, जहां समुद्री मार्ग पर नियंत्रण की कोशिश मित्र देशों के लिए भारी विफलता साबित हुई थी।

तुर्किये की सेना की तैयारी

उस समय ब्रिटेन और फ्रांस ने ओटोमन (तुर्की) के नियंत्रण वाले डार्डानेल्स जलडमरूमध्य को खोलने के लिए मुख्यत: नौसेना पर आधारित अभियान शुरू किया था, जिसे विंस्टन चर्चिल की रणनीति माना जाता है।मित्र राष्ट्रों ने तुर्की की सैन्य क्षमता को कम आंकते हुए पुराने युद्धपोतों के सहारे अभियान चलाया। लेकिन संकरे जलमार्ग में प्रवेश करते ही ये जहाज तटीय तोपखाने और समुद्री बारूदी सुरंगों के आसान लक्ष्य बन गए।

तुर्किये सेना ने पहले से ही मजबूत रक्षा तैयार कर रखी थी, जिसके चलते एंग्लो-फ्रेंच बेड़े को भारी नुकसान उठाना पड़ा और अभियान विफल हो गया। बाद में थल सेना उतारने के बावजूद आठ महीनों तक चले संघर्ष में करीब 4.83 लाख सैनिक मारे गए, लेकिन अंतत: मित्र देशों को पीछे हटना पड़ा।

गैलीपोली अभियान से कई महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं, जो आज के होर्मुज संकट में प्रासंगिक नजर आते हैं। पहला, किसी भी रणनीतिक निर्णय में केवल प्रभावशाली नेतृत्व पर निर्भर रहने के बजाय व्यापक और ठोस आकलन जरूरी होता है। दूसरा, विरोधी पक्ष को कमजोर आंकना भारी पड़ सकता है- 1915 में ‘गनबोट डिप्लोमेसी’ विफल रही थी और आज भी इसके सफल होने की संभावना संदिग्ध है।

क्या है ‘मिशन क्रीप’?

तीसरा, ‘मिशन क्रीप’ का खतरा- जब प्रारंभिक रणनीति असफल होती है तो बड़े देश अपने सैन्य प्रयासों को सीमित करने के बजाय बढ़ा देते हैं, जिससे संघर्ष और जटिल हो जाता है। चौथा, युद्ध में भारी मानवीय और आर्थिक नुकसान की अनदेखी अक्सर घातक साबित होती है।

विश्लेषकों के अनुसार, यदि होर्मुज में तनाव और बढ़ता है, तो इसका असर केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और नागरिक जीवन पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में इतिहास के सबकों को नजरअंदाज करना महंगा साबित हो सकता है।

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