आज मनाया जा रहा है दही हांडी उत्सव

भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित जन्माष्टमी का पावन पर्व लड्डू गोपाल की आराधना के लिए अधिक शुभ माना जाता है। इसके ठीक अगले दिन यानी भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि पर पूरे उत्साह के साथ दही हांडी का उत्सव मनाया जाता है। वैदिक पंचांग के अनुसार, यह उत्सव आज यानी 5 सितंबर को मनाया जा रहा है।

इस उत्सव को उत्साह और उल्लास के साथ भगवान श्रीकृष्ण की लीला के रूप में मनाया जाता है। इस खास अवसर पर दही हांडी को फोड़ा जाता है। इस दिन देशभर में खास रौनक देखने को मिलती है। अब आपके मन में सवाल आ रहा होगा कि आखिर दही हांडी उत्सव की शुरुआत कैसे हुई। आइए इस आर्टिकल में आपको विस्तार से इसके पीछे की वजह के बारे में बताते हैं।

कैसे हुई दही हांडी उत्सव की शुरुआत?
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण को माखन अधिक प्रिय था। इसलिए प्रभु के भोग में माखन को शामिल करने का विशेष महत्व है। बचपन के दौरान भगवान श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ गोपियों के घर जाकर माखन और दही खाया करते थे। इसी वजह से लड्डू गोपाल को माखन चोर के नाम से पुकारा जाता है।

गोपियां भगवान श्रीकृष्ण से माखन और दही को बचाने के लिए मटकी को ऊंचे स्थान पर लटकाने लगीं, लेकिन इसके बाद भी भगवान श्रीकृष्ण अपने सखाओं की मदद से माखन और दही चुराकर खाया करते थे। इसी लीला से दही हांडी उत्सव की परंपरा की शुरुआत हुई। इस उत्सव को हर साल धूमधाम के साथ मनाया जाता है। श्रीकृष्ण की इस बाल लीला का वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में मिलता है।

कैसे मनाया जाता है दही हांडी उत्सव?
जन्माष्टमी के अगले दिन मिट्टी की मटकी में दही और माखन भरकर उसे काफी ऊंचाई पर लटकाया जाता है। इसके बाद युवाओं की टोलियां एक मानव पिरामिड बनाती हैं और पिरामिड के सबसे ऊपर पहुंचकर हांडी को तोड़ा जाता है। मटकी फूटते ही उसमें रखा दही और माखन नीचे खड़े गोविंदाओं पर गिरता है, जिसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। इस दौरान ढोल-नगाड़े बजाए जाते हैं और श्रीकृष्ण के भजन चलाए जाते हैं।

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