Santan Saptami 2026: 18 या 19 सितंबर, संतान सप्तमी व्रत कब है? जानें महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

हिंदू धर्म में संतान सप्तमी व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। यह व्रत संतान की सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और लंबी आयु की कामना के लिए रखा जाता है। हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को संतान सप्तमी मनाई जाती है। इस बार तिथि को लेकर 18 या 19 सितंबर को लेकर लोगों में असमंजस है। आइए जानते हैं संतान सप्तमी व्रत की सही तारीख, शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजा विधि।

संतान सप्तमी 2026 कब है?

पंचांग के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि के आधार पर संतान सप्तमी का व्रत 19 सितंबर 2026 को रखा जाएगा। व्रत रखने वाले श्रद्धालु इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना करते हैं।

संतान सप्तमी को कई जगह ललिता सप्तमी के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा और व्रत करने से संतान से जुड़ी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

संतान सप्तमी व्रत का महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संतान सप्तमी का व्रत संतान के कल्याण और परिवार की सुख-शांति के लिए किया जाता है। माताएं और कई स्थानों पर पिता भी इस दिन व्रत रखते हैं। भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित इस व्रत में संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना की जाती है।

मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक पूजा करने से परिवार पर भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा बनी रहती है।

संतान सप्तमी की पूजा विधि

संतान सप्तमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनकर व्रत का संकल्प लें। इसके बाद पूजा स्थल की साफ-सफाई करके भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।

इसके बाद भगवान शिव को जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और फूल अर्पित करें। माता पार्वती को श्रृंगार की सामग्री, फूल और फल अर्पित किए जा सकते हैं। पूजा के दौरान शिव-पार्वती का ध्यान करते हुए संतान की सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करें।

पूजा के बाद संतान सप्तमी की व्रत कथा का पाठ या श्रवण करें और अंत में आरती करें। व्रत का पारण स्थानीय पंचांग में बताए गए समय और अपनी पारंपरिक मान्यता के अनुसार किया जाता है।

इन बातों का रखें ध्यान

संतान सप्तमी व्रत में पूजा के साथ मन की श्रद्धा और सात्विक आचरण को महत्वपूर्ण माना जाता है। व्रत रखने वाले व्यक्ति को दिनभर संयम बनाए रखना चाहिए। पूजा सामग्री और व्रत के नियम अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों की परंपराओं के अनुसार कुछ अलग हो सकते हैं।

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