रेलवे की शुरुआत का श्रेय भले ही भारत को गुलाम बनाने वाले अंग्रेजों को दिया जाता है लेकिन आज यह आम आदमी की मूलभूत जरूरत बन चुकी है। इसके बिना तो हम कहीं किफायती तरीके से जाने की कल्पना भी नहीं कर सकते, पर कभी आपने सोचा है कि जब पहली बार ट्रेन भारत में चली होगी तो उसका मंजर कैसा रहा होगा?
चलिए आज आपको भारत में शुरू हुई पहली पैसेंजर ट्रेन के ऐतिहासिक सफर पर ले चलते हैं।
भारतीय की पहली पैसेंजर ट्रेन की कहानी
16 अप्रैल 1853 के दिन भारत में पहली बार पैसेंजर ट्रेन पटरियों पर दौड़नी शुरू हुई थी। उस समय दोपहर के साढ़े तीन बज रहे थे और 400 यात्रियों को लिए यह ट्रेन मुंबई के बोरीबंदर स्टेशन से ठाणे के लिए रवाना हो रही थी। इसे अपने गंतव्य तक पहुंचने में 1 घंटे 15 मिनट का समय लगा।
पहली ट्रेन के इंजन: साहिब, सिंध और सुल्तान
पहली पैसेंजर ट्रेन को चलाने के लिए ब्रिटेन से खास तीन इंजन मंगवाए गए थे, जिनके नाम रखे गए : साहिब, सिंध और सुल्तान। इन्हीं तीन इंजनों की मदद से ट्रेन को खींचा गया और तब जाकर 14 डिब्बों वाली यह रेल अपने गंतव्य तक पहुंच पाई। कहते हैं कि इन इंजनों को बनाने में ब्रिटिश इंजीनियर रिचर्ड ट्रेविथिक का महत्वपूर्ण योगदान था।
उन्होंने साल 1804 में दुनिया के पहले भाप से चलने वाले इंजन का आविष्कार किया था, तब जाकर पूरी दुनिया में रेल का विस्तार संभव हो सका।
रेल बनाने का फैसला किसका था?
वैसे तो भारत में रेलवे नेटवर्क बनाने का सबसे पहले ख्याल लॉर्ड हार्डिंग को आया था। उनका मानना था कि रेलवे देश में व्यापार और सैन्य ताकत बढ़ाने में बेहद मददगार साबित होगी, लेकिन इस फैसले को निर्णायक बनाने में भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी की अहम भूमिका रही। उन्हीं की बदौलत पहली ट्रेन मुंबई के बोरीबंदर से ठाणे के बीच चली।
इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने प्लान अमल में लाने के लिए ब्रिटेन की प्राइवेट कंपनियों को न्योता दिया। नतीजतन ‘ग्रेट इंडियन पेनिंसुलर रेलवे’ (GIPR) नामक कंपनी को भारत में पहली बार पटरी बिछाने और ट्रेन शुरू करने का काम सौंपा गया। 1850 में इस काम को शुरू किया गया था और तीन सालों के अंदर दक्कन क्वीन बनकर तैयार भी हो गई थी।



