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गांधी परिवार की सबसे बड़ी मुसीबत नेशनल हेरल्ड मामले का विश्लेषण करेंगे

आज हम सबसे पहले गांधी परिवार की सबसे बड़ी मुसीबत नेशनल हेरल्ड मामले का विश्लेषण करेंगे. गांधी परिवार के लिए ये मामला पिछले कुछ वर्षों से सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ है. लेकिन ताज़ा अपडेट ये है कि इस परिवार के मालिकाना हक वाले Associated Journals Limited यानी AJL को दिल्ली का हेरल्ड हाउस खाली करना होगा. आज दिल्ली हाईकोर्ट ने गांधी परिवार को बड़ा झटका दिया. और दो हफ्ते के अंदर हेरल्ड हाउस खाली करने का आदेश सुना दिया. नेशनल हेरल्ड एक अख़बार समूह था, जिसे AJL चलाता था. इसे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने शुरू किया था.

2008 में घाटे की वजह से इस अख़बार ने अपने सभी प्रकाशन बंद कर दिए थे, लेकिन इसके 2 वर्षों के अंदर ही कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने एक ऐसी चाल चली, जिसमें सिर्फ़ 50 लाख रुपए ख़र्च करके नेशनल हेरल्ड का मालिकाना हक हासिल कर लिया गया और इस समूह की हज़ारों करोड़ रुपये की संपत्ति हड़प ली गई. देशभर में फैली नेशनल हेरल्ड की संपत्तियों में से एक संपत्ति ये भी है, जिस पर आज हाईकोर्ट का फैसला आया है. ये पूरा मामला थोड़ा पेचीदा है, इसलिए इसे समझने के लिए आपको इतिहास में जाना होगा.

Associated Journals Limited यानी AJL को 1962-63 में दिल्ली के बहादुर शाह ज़फर मार्ग पर करीब 14 हज़ार 700 वर्गफीट ज़मीन दी गई थी. 5 मंज़िला इमारत बनाने के लिए ये ज़मीन सस्ती कीमत पर दी गई थी. ज़मीन देते वक्त शर्त ये थी कि AJL ग्राउंड फ्लोर पर प्रेस चलाएगा और बाकी के 4 Floors पर उसका दफ्तर होगा. 10 जनवरी 1967 को जारी Lease-Deed के मुताबिक AJL इस बिल्डिंग का इस्तेमाल प्रेस के अलावा किसी और काम के लिए नहीं करेगा.

लेकिन 7 जनवरी 2013 को इन नियमों में बदलाव कर दिया गया. उस वक्त देश में कांग्रेस की सरकार थी और AJL पर गांधी परिवार का अधिकार हो चुका था. नए नियमों के मुताबिक सिर्फ बेसमेंट में प्रेस होगी और किसी भी एक फ्लोर पर AJL का ऑफिस होगा, जबकि बाकी के 4 Floors को Commercial इस्तेमाल के लिए किराये पर दिया जा सकता है. यानी सस्ती दरों पर हासिल की गई ज़मीन पर बनी बिल्डिंग को किराये पर दे दिया गया.

लेकिन फिर ये पता चला कि उस वक्त इस बिल्डिंग में कई वर्षों से कोई प्रेस नहीं चल रही है, और इस पूरी बिल्डिंग का सिर्फ कमर्शियल इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमें बहुत सी संस्थाओं को दफ्तर किराये पर दिए गए. इसके बाद Land and Development Office की तरफ से अक्टूबर 2016 में लीज़ तोड़ने का नोटिस जारी किया गया. लेकिन AJL की तरफ से कोई जवाब नहीं दिया गया.

फिर इसी वर्ष 30 अक्टूबर को Land and Development Office की तरफ से नोटिस जारी कर AJL को दो हफ्ते के भीतर बिल्डिंग खाली करने के लिए आदेश दिया गया. लेकिन इस नोटिस के खिलाफ AJL हाईकोर्ट चला गया. अपनी याचिका में AJL की तरफ से कहा गया कि ये पूरी कार्रवाई राजनीति से प्रेरित है और दुर्भावनापूर्ण है. आज हाईकोर्ट ने AJL की याचिका खारिज कर दी. और फैसला दिया कि दो हफ्तों के अंदर AJL को ये बिल्डिंग खाली करनी होगी.

आपको याद दिला दें कि नेशनल हेराल्ड मामला सबसे पहले ज़ी न्यूज़ ने ही दिखाया था. हमने तमाम दस्तावेज़ों और अपनी Investigative रिपोर्टिंग के ज़रिए इस मामले को देश के सामने उजागर किया था और ये बताया था कि कैसे मात्र 50 लाख रुपये खर्च करके हज़ारों करोड़ रुपये की नेशनल हेरल्ड की संपत्ति पर गांधी परिवार ने कब्ज़ा कर लिया था. इस पूरी धोखाधड़ी को समझने के लिए आपको इस केस का एक Revision करवाना ज़रूरी है.

वर्ष 1937 में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस पार्टी के पैसे से लखनऊ में Associated Journals Limited कंपनी बनाई. ये कंपनी अंग्रेज़ी में नेशनल हेरल्ड, हिंदी में नवजीवन, और ऊर्दू में कौमी आवाज़ नाम के अख़बार निकालती थी. आज़ादी के बाद Associated Journals को देश भर में काफी ज़मीनें मिलीं, सस्ते दर पर लोन मिला और इसकी संपत्ति लगातार बढ़ती गई. कांग्रेस पार्टी का मुखपत्र बन जाने की वजह से बाद में नेशनल हेरल्ड का प्रसार बढ़ा नहीं और उस पर गंभीर आर्थिक संकट आ गया.

हालत इतनी बुरी हो गई कि आखिर में वर्ष 2008 में नेशनल हेरल्ड का प्रकाशन बंद हो गया…उस वक्त Associated Journals पर करीब 90 करोड़ रुपये का कर्ज़ था. Associated Journals पर कर्ज़ तो था, लेकिन देश भर में उसकी संपत्ति करीब 5000 करोड़ रुपये थी, जिस पर मालिकाना हक के लिए धोखाधड़ी की चालें चली गईं और यही नेशनल हेरल्ड केस का मुद्दा है. इसके लिए कांग्रेस नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगे हैं. ये सब कैसे हुआ…ये जानना भी दिलचस्प है.

ये कहानी 23 नवंबर 2010 से शुरू हुई. जब गांधी परिवार के करीबियों ने यंग इंडियन नाम की एक कंपनी बनाई, जिसमें सोनिया गांधी के 38% और राहुल गाँधी के 38% शेयर थे. यानी कुल 76% हिस्सा सोनिया और राहुल गांधी का था, जबकि बचे हुए 24 फीसदी शेयर राहुल गांधी के करीबी सैम पित्रोदा, गांधी परिवार के करीबी सुमन दुबे, कांग्रेस के General Secratory ऑस्कर फर्नांडिज़ और AICC के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा के हैं.
यानी Young Indian कंपनी.. असलियत में कांग्रेस पार्टी प्राइवेट लिमिटेड थी.

अब सवाल ये है कि यंग इंडियन कंपनी ने क्या किया, जिससे AJL पर उसका कब्ज़ा हो गया. ये जानने के लिए आपको हमारी एक पुरानी रिपोर्ट देखनी होगी. आज से करीब 3 वर्ष पहले हमने पूरे देश के सामने ये खुलासा किया था.

जब से नेशनल हेरल्ड का ये पूरा केस ज़ी न्यूज़ देश के सामने लेकर आया है. हम लगातार एक ही सवाल उठा रहे हैं और वो सवाल ये है कि अगर नेशनल हेरल्ड केस सामने न आया होता और सबकुछ चुपचाप शांतिपूर्वक निपट गया होता, तो सोनिया गांधी और राहुल गांधी को हज़ारों करोड़ रुपये की संपत्ति बिना किसी कठिनाई के मिल गई होती. यहां इस बात को समझना ज़रूरी है कि ये हज़ारों करोड़ रुपये. देश के काम नहीं आने वाले थे और ना ही ये संपत्ति सोनिया और राहुल गांधी को मिलने से देश की जनता का कोई कल्याण होने वाला था. इससे सिर्फ सोनिया गांधी और राहुल गांधी के बैंक बैलेंस का कल्याण होने वाला था.

राहुल गांधी और सोनिया गांधी दोनों इस मामले में दिल्ली की एक निचली अदालत से ज़मानत पर हैं. इन दोनों पर धोखे से नेशनल हेरल्ड की हज़ारों करोड़ रुपये की संपत्ति हड़पने का आरोप है, लेकिन उन्हें दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट से दिसंबर 2015 में ज़मानत मिल गई थी.

हालांकि जुलाई 2017 में ये अखबार फिर से शुरू हुआ. इस अखबार का Online Edition भी है. जिसमें ये तीनों भाषाओं यानी अंग्रेज़ी, हिंदी और उर्दू में है. ये अखबार शुरुआत से ही कांग्रेस का मुखपत्र हैं और अभी भी इस अखबार में कांग्रेस के पक्ष ही ख़बरें छपती हैं. पत्रकारिता के कई बड़े नाम इस अखबार से जुड़े हुए हैं. ये वो पत्रकार हैं, जो अपने आपको बड़ा निष्पक्ष बताते हैं, लेकिन जब ऐसे पत्रकार ऐसे संस्थान से जुड़ते हैं, तो उनकी निष्पक्षता और नैतिकता पर सवाल उठता है, क्योंकि ये पत्रकार जानते हैं कि नेशनल हेरल्ड में धोखाधड़ी के जरिये पैसा लगा हुआ है. जो पत्रकार पूरी दुनिया के ऊपर सवाल उठाते हैं, वो अगर किसी ऐसी दागी या विवादित कंपनी से जुड़ते हैं, तो उनकी निष्पक्षता और नैतिकता भी सवालों के घेरे में आती है. नेशनल हेरल्ड से जुड़कर इन बड़े बड़े और पुराने पत्रकारों ने अपने आपको कांग्रेस पार्टी के मीडिया सेल का कार्यकर्ता बना लिया है.

हालांकि ऐसे मीडिया संस्थान के बारे में पार्टियों की तरफ से ये कहा जाता है कि पार्टी का इससे सीधे तौर पर कोई लेना देना नहीं है, संपादक ही संपादकीय नीति तय करेंगे, लेकिन ऐसा होता नहीं है. इस पूरे केस में हाईकोर्ट में कांग्रेस पार्टी की मुख्य दलील ये थी कि ये मामला राजनीति से प्रेरित है. आज हमें 80 और 90 का दशक याद आ रहा है. क्योंकि उस दौर में जब भी कोई बड़ा नेता फंसता था, या कोई बड़ी घटना होती थी तो ये कहा जाता था कि इस घटना के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ है, लेकिन आज जब कोई नेता धोखाधड़ी या भ्रष्टाचार के मामले में फंसता है, तो सीधे ये कह देता है कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी ऐसा करवा रहे हैं और ये पूरा मामला राजनीति से प्रेरित है.

लालू यादव के मामले में भी ऐसा ही हुआ. जब लालू यादव भ्रष्टाचार के दोषी पाए गए और वो जेल गए तो उनकी तरफ से भी यही कहा गया कि राजनीति से प्रेरित मामला है. लेकिन अदालत तथ्यों के आधार पर फैसले देती है. कोई भी फैसला सुनाने से पहले अदालत उस मामले के तथ्य देखती है और इस मामले में भी ऐसा ही हुआ.

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